मेरा शहर, छोटा सा शहर, नई टिहरी

कैसे होते हैं ये छोटे शहर, कैसी होती है इनकी दुनिया, कैसे होते हैं यहां के लोग, क्या खाते हैं क्या पीते हैं और कैसे रहते है?

छोटे शहर वो होते हैं जहां दुनियाभर का शोर नहीं होता , न दौड़कर आगे जाने की चाह होती है और न किसी को पीछे खींचने की होड़। इनकी दुनिया ही अलग होती है। साधारण सा जीवन , जहां दिखावे की बनावटी दुनिया नहीं होती। संसाधन भले ही कम होते हैं लेकिन जरूरतें उनसे भी पूरी हो जाती है।

उन शहरों की तासीर ही कुछ ऐसे होती की कभी कुछ और चाहने की चाह न खटकती, कुछ ऐसा अपनापन होता की उससे कभी दूर भी चले जाओ वहां की यादें आपको वापस वहीं लाकर खड़ा कर देती।

ये सब आज इसलिए की, मैं भी एक ऐसे ही छोटे शहर से हूं,  जहां मैं पली बढ़ी, मेरा स्कूल वहां था , मेरा घर वहां था, मेरा बचपन वहां से जुड़ा है, और ये सब जीवन के वो अनमोल और महत्वपूर्ण पहलू हैं जिनकी यादें पूरी जिंदगी को जीने का एक खूबसूरत नजरिया देती हैं।

तो मैं उत्तराखंड के गढ़वाल मंडल के टिहरी जिले के नई टिहरी शहर की हूं। मैने अपने जीवन के लगभग 18 साल वहां बिताए हैं, शहर को बदलते देख, खुद को बदलते देख, शायद शहर के साथ साथ हम भी बदल रहे थे, कुछ छोटे छोटे बदलाव हम पर भी आ रहे थे।

उस शहर से मेरी बहुत सी यादें जुड़ी हैं और वो यादें ऐसी हैं जिसकी पोटली खुल गई तो वो हैरी पॉटर के नायिका हरमाइनी ग्रैंजर के उस बैग जैसी होगी जो था तो बहुत छोटा पर उसके अंदर हर चीज समाई हुई थी।

एक के बाद एक ऐसी याद आती जायेंगी, ऐसे किस्से सामने खुलते जाएंगे जो बस मन को अंदर से इतना हल्का करेंगे , इतना सुकून, खुशी देंगे, जो और किसी से न मिले।

हमारा वो छोटा सा शहर कुछ ज्यादा बड़ा नहीं था, इतना बड़ा था कि आप पैदल पैदल चल कर आराम से एक कोने से कोने तक पहुंच सकते थे, किसी ई रिक्शा, या विक्रम की जरूरत नहीं पड़ेगी।

वहां कभी कोई ज्यादा शोर नहीं था, बस बाजार जैसी जगहों को छोड़कर। वरना सड़के लगभग खाली ही मिलेंगी, मौसम हमेशा की तरह सुहावना, एक बारिश के बाद अभी भी स्वेटर की जरूरत पड़ जाए। कुछ गिने चुने स्कूल, ब्लॉक्स में बटी बिल्डिंगे जैसे c block, e block, h block , j block k block

J block में हम लोग रहते थे, दो बिल्डिंगे साथ में थी, वैसे सारी ही बिल्डिंगे सीढ़ियों से जुड़ी हुई हरी और गुलाबी रंग से रंगी हुई थी, हर बिल्डिंग में 6 परिवार। हर कोई हर किसी को जानता, बच्चे सब झुंड बनाकर स्कूल जाते, और कुछ बसों में। सब एक साथ त्यौहार मनाते, खुद से पहले पड़ोसियों के घर मिठाइयां बांटने जाते , तो ये सब होता था हमारे शहर में।

मैने उस शहर की हमेशा एक शांत प्रवृत्ति देखी,  छोटा पर मजबूत, धैर्य वाला, खुबसूरती यूं की बस देखते ही रहो, पलकें झपकाने का मन न करे, शांत यूं की खुद की धड़कनें भी सुनाई दे, पक्षी सारा दिन खुल के पंख फैलते, हरा सा भरा सा, थोड़ा सा पर पूरा सा।

मैं शायद उस शहर सी शांत न हो पाऊं, पर उस तरह बनने का प्रयास जारी है, और उसके बारे में सोचना एक सुकून सा देता है मन को। शायद उस शहर के किसी कोने में खुद का मन कहीं छोड़ आई थी या उसे अपने दिल में लेके चली आई थी। 

वहां रहके कभी वाहनों की इतनी जरूरत न लगी, हर जगह पैदल निकल जाते। हां सीढ़ियों ने जी जरूर जलाया रहता था, क्योंकि स्कूल जाने के लिए सीढ़ियों का ही सहारा था, इतने बड़े बड़े बैग और फिर उन निर्दयी सीढ़ियों की चढ़ना उफ्फ।

जहां जाना है सबके साथ जाना है, कहीं न कहीं कोई न कोई जान पहचान का टकरा ही जाता। मोहल्ले में किसी के घर भी शादी होती तो हर जगह कार्ड जाता, तो फिर शादी में जाने के लिए भी हर कोई तैयार हो जाता। सारे साथ में जाते साथ में आते दुनियाभर की गप्पों के साथ।

और जिस स्कूल में मैं पढ़ती थी वो भी शहर का एक बड़ा स्कूल था निजी स्कूल था, पर अच्छा था, मेरी यादों से जुड़ा एक स्थान जहां बहुत किस्से बने हैं। सरस्वती विद्या मंदिर, छठी से लेकर बारहवीं तक की कक्षाएं थी वहां। हमारे स्कूल की रैली बहुत बड़ी होती थी, 15 अगस्त और 26 जनवरी को खासकर हमारे रैली निकलती थी , जोर शोर से नारों के साथ, ये लंबी सी, आधे शहर में तो घूमते ही थे, बच्चों के घरवाले सारे बाहर आ जाते रैली देखने को, और बच्चे खुश।

सारे गुरु बहुत अच्छे, हर कक्षा में नए गुरुओं से पढ़ते। कुछ बड़े मजेदार, कुछ थोड़ा गंभीर, कुछ थोड़े खडूस, कुछ बहुत ही शानदार। स्कूल में मार और डांट भी बहुत खाई और शाबाशी भी मिली, जहां गुरुओं से नाराज़ भी हुए तो वहीं कुछ दोस्त भी बने। अभी तक कई शिक्षकों की याद हैं मुझे, मिश्रवान सर, नौटियाल सर, रतूड़ी आचार्य जी, प्रधानाचार्य जी, रोशनी मैंम , श्रीवास्तव सर, रांगड सर, सजवान सर, भट्ट आचार्य जी, कमल सर (एक क्रांति वाले सर, जिनके आने से पूरे शहर में हलचल हो गई थी, ज्यादातर बच्चे उनसे रसायन विज्ञान पढ़ते थे, और हमारे स्कूल में आने के बाद बहुत से शिक्षक जलते भी थे अगर सीधी सी भाषा में कहूं) और भी बहुत से ।

अभी वहां के किस्से नहीं छेड़ूंगी, वरना लिखते लिखते थक जाऊंगी तो उसे दूसरे लेख के लिए बचा रही हूं।

खाने पीने के मामले में भी साधारण सा स्वाद था सबका। जब तक में थी तो मोमोज , पिज़्ज़ा का चलन नहीं था वहां ज्यादा। सब चाऊमीन, टिक्की, क्रीमरोल, समोसा, जलेबी जैसे के शौकीन थे। ऊपर नई टिहरी में समोसे वाले की दुकान प्रसिद्ध थी, और नीचे बौराड़ी में टिक्की वाले की, शाम के वक्त इतनी भीड़ लगती कि नंबर आते आते सारी टिक्की खत्म हो जाती। फल , सब्जियां ठीक मिल जाती ।

नई टिहरी में रहने का फायदा एक यह भी था कि वो गांव से नजदीक था तो चाहे नानी हो या मासी, दादी हो ओर कोई और गांव से कुछ न कुछ भिजवा ही देता था। तो वहां रहके काफल, हीशर, माल्टे, गांव की मट्ठा, कोदा, झंगोरा खूब खाया।

तो ये थे मेरे छोटे शहर के कुछ रंगीन पहलू। ये बस बहुत थोड़े से हैं , और चर्चा दूसरे लेख में। नई टिहरी वालों इसे जरूर पढ़ना। दावे से कहती हूं ये लेख आपको भी उन यादों के पास जरूर लेके जाएंगे जो आपने वहां बनाई है। ये बस मेरी नजरिया है , मेरा पहलू है, आपका कुछ अलग हो , तो शहर से जुड़े किसी को कोई याद या किस्सा मन में आए तो कमेंट मैं जरूर लिखना ।

तब तक, आपकी अपनी अभिलाषा।